TRAI और मुंबई क्राइम ब्रांच के नाम पर ‘डिजिटल अरेस्ट’ का जाल — ED वेरिफिकेशन के बहाने ₹7.12 करोड़ की साइबर ठगी, 12 आरोपी गिरफ्तार
भारत में साइबर अपराधियों ने अब ठगी के नए-नए तरीके अपनाने शुरू कर दिए हैं। हाल ही में अहमदाबाद सिटी साइबर क्राइम ब्रांच ने एक ऐसे बड़े गिरोह का पर्दाफाश किया है, जिसने TRAI और मुंबई क्राइम ब्रांच के नाम पर लोगों को डराकर ED (प्रवर्तन निदेशालय) वेरिफिकेशन के बहाने ₹7.12 करोड़ की ठगी की। इस मामले में 12 आरोपियों को गिरफ्तार किया गया है और गिरोह की अंतरराष्ट्रीय कड़ियाँ भी सामने आई हैं ।
क्या है पूरा मामला?
आरोपियों ने खुद को TRAI, मुंबई क्राइम ब्रांच, CBI और ED के अधिकारी बताकर पीड़ित को फोन किया। पीड़ित को बताया गया कि वह मनी लॉन्ड्रिंग और अन्य गंभीर अपराधों में शामिल है और उसके खिलाफ मुंबई क्राइम ब्रांच में मामला दर्ज है।
डर पैदा करने के लिए आरोपियों ने:
CBI/ED लेटरहेड,
इंटरपोल रेड नोटिस,
आधार कार्ड,
और डिजिटल दस्तावेज भेजे।
इसके बाद पीड़ित को ED वेरिफिकेशन के नाम पर बैंक खाते में जमा राशि ट्रांसफर कराने को कहा गया और भरोसा दिलाया गया कि जांच पूरी होते ही पैसे लौटा दिए जाएंगे। इस पूरी अवधि में पीड़ित को WhatsApp कॉल के जरिए ‘डिजिटल अरेस्ट’ में रखा गया—यानि लगातार निगरानी, धमकी और मानसिक दबाव।
‘डिजिटल अरेस्ट’ क्या होता है?
‘डिजिटल अरेस्ट’ कोई कानूनी प्रक्रिया नहीं है। यह साइबर ठगों की मनोवैज्ञानिक रणनीति है, जिसमें:
पीड़ित को लगातार कॉल/वीडियो कॉल पर रखा जाता है,
डर और जल्दबाजी पैदा की जाती है,
परिवार या वकील से बात न करने की धमकी दी जाती है,
और पैसों का ट्रांसफर कराया जाता है।
इस केस में पीड़ित को 16 से 26 दिसंबर 2025 तक डिजिटल अरेस्ट में रखकर ठगी की गई ।
ठगी की रकम कैसे घुमाई गई? (Modus Operandi)
जांच में सामने आया कि ठगी की रकम:
कई बैंक खातों (लेयरिंग) में ट्रांसफर की गई,
IMPS/चेक/ATM/UPI के जरिए निकासी हुई,
बाद में USDT (क्रिप्टोकरेंसी) में कन्वर्ट की गई,
और अंततः अंतरराष्ट्रीय (चीनी) नेटवर्क तक पहुंचाई गई।
NCRP पोर्टल पर जांच में यह भी सामने आया कि आरोपियों से जुड़े खातों पर 238 से अधिक शिकायतें दर्ज हैं, जो अलग-अलग राज्यों से संबंधित हैं ।
कौन-कौन गिरफ्तार हुआ?
अहमदाबाद और सूरत में अलग-अलग टीमों ने कार्रवाई कर 12 आरोपियों को गिरफ्तार किया। इनमें बैंक खाते उपलब्ध कराने वाले, कमीशन पर पैसे आगे बढ़ाने वाले और क्रिप्टो में बदलकर अंतरराष्ट्रीय गिरोह तक पहुंचाने वाले सदस्य शामिल हैं। आरोपियों के पास से:
16 मोबाइल फोन,
SIM कार्ड,
- और ₹1.73 लाख नकदबरामद किए गए हैं ।
कानूनी धाराएं
इस मामले में भारतीय न्याय संहिता (BNS) और आईटी एक्ट की गंभीर धाराओं के तहत केस दर्ज किया गया है, जिनमें धोखाधड़ी, जालसाजी, पहचान की चोरी और साइबर फ्रॉड से जुड़ी धाराएं शामिल हैं ।
ऐसी ठगी से कैसे बचें? (Cyber Safety Tips)
TRAI, CBI, ED या पुलिस कभी भी फोन/वीडियो कॉल पर पैसे ट्रांसफर नहीं कराती।
डिजिटल अरेस्ट नाम की कोई कानूनी प्रक्रिया नहीं है।
डराने वाले कॉल आएँ तो तुरंत कॉल काटें और किसी भरोसेमंद व्यक्ति/वकील से बात करें।
किसी भी दस्तावेज या लेटर की स्वतंत्र रूप से जांच करें।
ठगी की आशंका हो तो 1930 पर कॉल करें या cybercrime.gov.in पर शिकायत दर्ज करें।
यह मामला एक बार फिर साबित करता है कि साइबर अपराधी सरकारी एजेंसियों की नकली पहचान का इस्तेमाल कर आम लोगों को डराते हैं और बड़ी रकम हड़प लेते हैं। सतर्कता, जानकारी और त्वरित शिकायत ही इस तरह की ठगी से बचाव का सबसे मजबूत हथियार है।
याद रखें: डर में लिया गया फैसला ही साइबर ठगों की सबसे बड़ी जीत होती है।
